| Was sollen Märchen in unserer rationalen Welt? Die Antwort ist schnell gefunden: |
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| Was das Märchen dem Zuschauer schenkt, ist der Glaube an |
die |
| eigene |
Kraft, |
an |
das |
Glück, |
ist |
Selbstvertrauen |
und |
Zuversicht |
mit dieser Welt fertig zu werden. |
| Der |
Inhalt |
des |
Märchens |
ist |
bekannt: |
Die |
Lüge |
einer |
bösen |
| Ziege, |
sie |
sei |
nicht |
ordentlich |
gefüttert |
worden. |
-Wovon |
soll |
ich |
| satt |
sein, |
ich |
sprang |
nur |
über |
Gräbelein |
und |
fand |
kein |
einzig |
| Blättelein.- |
bringen |
einen |
Schneider |
dazu, |
seine |
drei |
Söhne |
| fortzujagen. |
Diese |
lernen |
in |
der |
Fremde |
ein |
ordentliches |
| Handwerk |
und |
kehren |
schließlich |
mit |
den |
zauberhaften |
| Geschenken ihrer Meister |
zum Vater zurück. |
Der Schreiner |
Hans |
| besitzt |
einenTisch, |
der |
in |
Windeseile |
die |
besten |
Speisen |
| hervorbringt, |
der |
Müller |
Franz |
hat |
einen |
Esel |
erhalten, |
der |
auf |
| Kommando |
Dukaten |
speit, |
Bevor |
die |
Söhne |
ihrem |
Vater |
diese |
| wundervollen |
Dinge |
jedoch |
zeigen |
können, |
werden |
sie |
von |
| einem |
Wirt, |
in |
dessen |
Wirtshaus |
sie |
auf |
ihrer |
Wanderschaft |
| ausruhen, |
gestohlen.In |
dieses |
Wirtshaus |
kehrt |
auch |
ihr |
Bruder, |
| der Drechsler |
Georg |
ein, |
der von |
seinem |
Meister |
einen |
Knüppel |
| bekam, |
der |
wie |
von |
unsichtbarer |
Hand |
geführt, |
den |
diebischen |
| Wirt |
verprügelt |
und |
ihn |
so |
zur |
Rückgabe |
der |
gestohlenen |
Gegenstände zwingt. |
| In |
einem |
aufwendigen |
Bühnenbild, |
das |
die |
Zuschauer |
in |
das |
| Mittelalter |
führt, |
ereignen |
sich |
außer |
den |
bekannten |
drei |
| Zaubereien |
noch |
weitere |
magische |
Dinge, |
die |
das |
Publikum |
begeistern. |
| In die Handlung ist ein |
quicklebendiger Kobold integriert, der |
den |
| ständigen |
Kontakt |
zwischen |
Bühne |
und |
Publikum |
herstellt |
und |
die Zuschauer zum Mitmachen anregt. |
| Dieses |
Theaterstück |
erhielt |
1989 |
beim |
Internationalen |
Kinder- |
| und |
Jugendtheaterfestival |
in |
Singapur |
den |
1. |
Preis |
und |
| begeisterte |
im |
gleichen |
Jahr |
auch |
die |
Kinder |
des |
schwedischen |
Königshauses in Stockholm. |
| Seit |
37 |
Jahren |
gilt |
unsere |
große |
Liebe |
dem |
Kinder- |
und |
| Familientheater. |
Wir |
wollen |
den |
Zuschauern |
die |
phantastische |
| Welt |
des |
Mediums |
Theater |
hautnah |
vermitteln |
und |
wissen |
auch |
| um |
die |
immer |
wieder |
immense |
Herausforderung |
die |
gerade |
das |
| junge |
Publikum |
uns |
abverlangt. |
Kein |
Erwachsener |
kann |
so |
| kritisch |
sein |
wie |
ein |
Kind. |
Daher |
gebührt |
dem |
Kind |
das |
beste |
| Theater, |
das |
Theater |
mit |
Herz |
und |
Liebe |
zum |
Detail. |
Ein |
| Theater, |
das |
die |
Kinder |
neugierig |
macht |
und |
nicht |
bekannte |
Dinge aus Film und Fernsehen adaptiert. |
| Regie: |
Annette Greve |
| Dramatisierung: |
Georg A. Weth |
| Tournee: |
Ganze Spielzeit 2005/2006 |
Auch für Freilichtaufführungen bestens geeignet ! |